भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१३७ 'वृष' लग्न की कुंडली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवेंभाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च भी अधिक रहता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आ जाती है। सातवी सामान्य मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक झगड़े-टंटे तथा शत्रुओं के क्षेत्र में बड़ी युक्तियों से काम लेकर सफलता प्राप्त करता है। २४८ 'वृष' लग्न में 'मंगल' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहलेभाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित सप्तमेश एवं व्ययेश मंगल के प्रभाव से जातक की रक्त- विकार, धातुक्षीणता, दुर्बलता आदि की शिकायत रहती है, परन्तु शारीरिक-शक्ति का भी लाभ होता है। बाहरी स्थानों से अच्छे संबंध रहते हैं। चौथी मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्रीय सप्तम- भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। आठवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व संबंधी परेशानियां उपस्थित होती रहती हैं। २४९ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरेभाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के विषय में चिन्तायें बनी रहती हैं, परन्तु बाहरी संबंधों से लाभ होता है। चौथी मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं संतान का पक्ष भी कमजोर रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण आयु एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र में भी हानि तथा चिन्तायें उपस्थित होती रहती हैं। आठवीं उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक के धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती रहती है एवं जातक भाग्यशाली माना जाता है। २५०