भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

१४१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त होती है, मंगल के सप्तमेश होने के कारण स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलता मिलती है। चौथी नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण भाई-बहिन के सुख एवं पराक्रम में कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर विजय मिलती है तथा आठवीं दृष्टि से स्वराशि वाले सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में हानि- लाभ के योग बनते बिगड़ते रहते हैं। 'वृष' लग्न में 'बुध' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित द्वितीयेश तथा पंचमेश बुध के प्रभाव से जातक सुन्दर, प्रतिष्ठित यशस्वी तथा कुटुम्ब एवं धन की शक्ति पाने वाला होता है। विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का पक्ष भी अच्छा रहता है। सातवीं समदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता एवं सहयोग की प्राप्ति होती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि स्थित बुध के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब की उत्तम वृद्धि होती है, परन्तु सन्तान पक्ष में परेशानियां रहती हैं। विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को आयु तथा पुरातत्व का लाभ होता है। ऐसी ग्रहस्थिति वाला जातक ऐश्वर्यशाली जीवन बिताता है।