भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१४३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष द्वारा अशान्ति का अनुभव करता है, परन्तु अपने बुद्धि-बल से उस पर कुछ सफलता भी पा लेता है। सन्तान तथा कुटुम्ब से मतभेद एवं परेशानी के योग भी उपस्थित होते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च की अधिकता रहती है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सम्मान तथा धन मिलता रहता है।


'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को बुद्धिमान स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। विद्या, कुटुम्ब तथा सन्तान पक्ष से सुख एवं धन प्राप्ति के योग भी उपस्थित होते रहते हैं। सातवीं दृष्टि मित्र से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को शारीरिक सौन्दर्य, यश, प्रतिष्ठा, बुद्धि, विवेक, धन एवं सफलताओं की प्राप्ति भी होती है।


'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा धन-संचय की शक्ति में वृद्धि होती है, परन्तु कुटुम्ब, विद्या एवं सन्तान पक्ष से परेशानियों का अनुभव होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक कठिन परिश्रम द्वारा धनो- पार्जन करता है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन ऐश्वर्यपूर्ण होता है।