भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१४४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक बुद्धि-योग द्वारा अपने भाग्य एवं धन की वृद्धि करता है तथा धर्म, विद्या, सन्तान एवं कुटुम्ब विषयक सुखों को भी प्राप्त करता है। सातवीं दृष्टि से तृतीय भाव को देखने के कारण जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में भी विशेष वृद्धि होती है। ऐसा जातक सुखी, धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक पिता एवं राज्य पक्ष से विशेष लाभ तथा सम्मान प्राप्त करता है। अपने बुद्धि-बल द्वारा व्यवसाय से पर्याप्त आर्थिक लाभ भी कमाता है। सन्तान पक्ष से भी सुखी रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण जातक को माता, भूमि, भवन तथा परिवार का यथेष्ठ सुख भी प्राप्त होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि में स्थित बुध के प्रभाव से जातक को आय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं तथा धन-संचय में बाधा पड़ती है। कुटुम्ब, सन्तान एवं मित्र पक्ष से भी अल्प लाभ मिलता है तथा चिन्ताओं के कारण मस्तिष्क परेशान बना रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले पंचमभाव को देखने के कारण जातक विद्वान् तथा बुद्धिमान होता है तथा उसका सन्तान पक्ष भी प्रबल बना रहता है।