भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१४५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहम भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक बना रहता है। साथ ही विद्या, सन्तान, कुटुम्ब एवं धन के पक्ष से भी असन्तोष रहता है। सन्तान-पक्ष में हानि भी उठानी पड़ती है। सातवीं मित्र दृष्टि में षष्ठभाव को देखने के कारण जातक अपने बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष पर सफलता प्राप्त करता रहता है। 'वृष' लग्न में 'गुरु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को शारीरिक परिश्रम द्वारा लाभ होता है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की उन्नति होती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या- बुद्धि का लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष सामान्य रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष से त्रुटिपूर्ण सफलताएँ मिलती हैं। नवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक के भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा जातक परिश्रम द्वारा उन्नति करता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में अपने शत्रु/(मित्र) बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की धन तथा कौटुम्बिक सुख प्राप्त करने में कुछ कठिनाइयां आती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। पांचवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठ- भाव को देखने से शत्रु पक्ष पर विजय प्राप्त होती है तथा नवीं समदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण राज्य पक्ष में सामान्य सफलता मिलती है, पिता से वैमनस्य रहता है तथा व्यवसाय की उन्नति के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है।