भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१४७ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित अष्ट- मेश बुध के प्रभाव से जातक शत्रु पक्ष में अपनी बुद्धिमत्ता से विजय प्राप्त करता है परन्तु आयु तथा पुरातत्त्व के लाभ में कमी रहती है। पांचवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी सम्बन्धों के अच्छा लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक रहता है। नवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के कारण विशेष परिश्रम करके धन-संचय में सफलता मिलती है, परन्तु कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित अष्टमेश तथा व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय पक्ष में कठिनाइयां आती हैं, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में दुर्बलता रहती है। नवीं उच्चदृष्टि से तृतीय भावको देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा जातक स्वार्थी, धनी तथा ऊपरी दृष्टि से सज्जन प्रतीत होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न अष्टमभाव: गुरु आठवें भाव में स्वराशि पर स्थित अष्टमेश गुरु के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु आय के साधनों में कुछ कठिनाइयों भी आती हैं। पांचवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च की अधिकता रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के परिश्रम द्वारा कुटुम्ब तथा धन की वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन एव सुख के पक्ष में कुछ असन्तोष रहता है।