भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१४८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित अष्टमेश एवं व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म- पालन में कमजोरी रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने के कारण शारीरिक सौंदर्य में कमी रहती है तथा प्रभाव-वृद्धि के लिए विशेष यत्न करना पड़ता है। सातवीं उच्चदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं शत्रु- दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण सन्तान तथा विद्या के पक्ष में कमजोरी रहती है। कुल मिलाकर इस ग्रह-स्थिति के कारण जातक की उन्नति, प्रतिष्ठा, प्रभाव तथा ऐश्वर्य में कमियां बनी रहती हैं। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित अष्टमेश गुरु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है, लाभ-प्राप्ति के मार्ग में भी सफलता कम मिलती है। पाँचवीं मित्र- दृष्टि से द्वितीयभाव के देखने के कारण धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब का सहयोग मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि एवं भवन आदि का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु- पक्ष से परेशानी रहती है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में स्वराशिस्थ अष्टमेश गुरु के प्रभाव से जातक को आमदनी अच्छी रहती है, परन्तु परिश्रम अधिक करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। पंचम उच्च दृष्टि से तृतीयभाव की देखने के कारण पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख का लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में कम लाभ होता है। नवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से व्यवसाय द्वारा पर्याप्त लाभ होता है परन्तु स्त्री-पक्ष से कुछ कठिनाइयों के साथ सुख मिलता है। ऐसा जातक ऐश्वर्यशाली होता है।