भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृषलग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थान के सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च की अधिकता रहती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण कुछ कठि- नाइयों के साथ सुख के साधन प्राप्त होते हैं, परन्तु माता के सुख में कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से छठे भाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर बुद्धिमानी द्वारा प्रभाव स्थापित होता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयुपक्ष में कुछ कमी रहती है, पुरातत्त्व की हानि होती है तथा आमदनी से खर्च अधिक बना रहता है। 'वृष' लग्न में 'शुक्र' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में स्वराशि में स्थित शुक्र के भाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं आत्मिक बल में वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती रहती है। परन्तु कभी-कभी रोगों का शिकार भी बनना पड़ता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में बुद्धिमानी द्वारा सफलता मिलती है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह स्थिति का जातक सुखी जीवन व्यतीत करता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक अपने शारीरिक परिश्रम द्वारा धन एवं कुटुम्ब की वृद्धि करता है, परन्तु शारीरिक सुख में कुछ कठिनाइयां भी आती रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ कमी बनी रहती है, परन्तु शत्रु-पक्ष से चातुर्य द्वारा लाभ मिलता है।