भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१५० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन का सुख कुछ वैमनस्य के साथ प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक धर्मात्मा तथा भाग्यवान् होता है। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक पराक्रमी, चतुर तथा परिश्रमी होता है और इन्हीं गुणों के बल पर धन, यश, मान, प्रतिष्ठा आदि प्राप्त करता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी आती है तथा भूमि, भवन के सुख के बारे में भी कुछ असन्तोष रहता है, परन्तु इन सब कमियों के बावजूद सुख के साधन प्राप्त होते रहते हैं। शत्रु-पक्ष पर शान्ति तथा चातुर्य द्वारा सफलता मिलती है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता, 'राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा यश, मान, प्रतिष्ठा एवं उन्नति का लाभ होता रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में नीचराशिस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक का विद्या तथा सन्तान-पक्ष कमजोर रहता है, परन्तु वह अपने बुद्धि-चातुर्य द्वारा शत्रु-क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। सातवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण कठिन परिश्रम एवं दिमाग की सूझ-बूझ से आमदनी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। ऐसी ग्रहस्थिति वाला जातक, चिन्ता, असन्तोष, मस्तिष्क में परेशानी एवं शारीरिक सौन्दर्य में कमी प्राप्त करता है।