भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव से जातक शारीरिक शक्ति एवं चातुर्य के द्वारा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है, परन्तु शुक्र के लग्नेश होकर षष्ठभाव में बैठने के कारण शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी भी रहती है। माता द्वारा लाभ एवं परतन्त्रता का योग भी बनता है। सातवीं समदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च की अधिकता रहती है। ऐसी ग्रहस्थिति वाला जातक किसी-न-किसी झगड़े में फंसा ही रहता है, परन्तु बड़ा प्रतापी भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : सप्तमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से वैमनस्य तथा परेशानी के योग बनते हैं तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठोर शारीरिक परिश्रम द्वारा सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने के कारण जातक सांसारिक कार्यों में परम दक्ष होता है, परन्तु शरीर रोगी भी बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोगादि का कष्ट बना रहता है। आयु की शक्ति प्राप्त होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ गुप्त चातुर्य के बल पर होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक कठिन परिश्रम से धन की वृद्धि करता है। मामा के पक्ष में कमजोरी, शत्रु-पक्ष से कष्ट एवं उदर- विकारादि के योग भी बनते हैं।