भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक शारीरिक श्रम द्वारा भाग्योन्नति करता है तथा शत्रुपक्ष में सफलता पाता है। शरीर सुन्दर होता है, परन्तु रोगादि के योग उपस्थित होते रहते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। शत्रु एवं झगड़े के क्षेत्र में विजय मिलती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का पिता के साथ सामान्य वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों तथा परिश्रम के साथ सफलता मिलती है। शत्रुपक्ष पर प्रभाव बना रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी, सुखी तथा उन्नतिशील होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में उच्च राशिस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा आमदनी को बढ़ाता है। यह सुन्दर होने के साथ ही रोगी भी रहता है तथा शत्रुपक्ष से लाभ मिलता है। सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण सन्तान पक्ष में कमी तथा विद्याध्ययन में लापरवाही रहती है। ऐसा व्यक्ति अनेक प्रयत्नों द्वारा अच्छा लाभ उठाता तथा उन्नति करता है।