भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 638 में से

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१५३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बाहरवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ उठाता है। वह शरीर से दुर्बल होने पर भी परिश्रमी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष से कुछ हानि भी उठाता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, रोगी तथा धन कमाने में कुशल परन्तु शत्रुओं द्वारा पीड़ित होता है। 'वृष' लग्न में 'शनि' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक सुन्दर तथा भाग्यवान होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव की देखने के कारण भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशम भाव को देखने से पिता एवं राज्य द्वारा लाभ तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है, परन्तु सुख में कुछ कमी आती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने से माता के सुख में कमी होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु बढ़ती है। दसवीं शत्रु दृष्टि से एकादशभाव की देखने के कारण आमदनी के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं। राज्य के क्षेत्र में भी प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है।

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