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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

१५३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बाहरवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ उठाता है। वह शरीर से दुर्बल होने पर भी परिश्रमी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष से कुछ हानि भी उठाता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, रोगी तथा धन कमाने में कुशल परन्तु शत्रुओं द्वारा पीड़ित होता है। 'वृष' लग्न में 'शनि' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक सुन्दर तथा भाग्यवान होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव की देखने के कारण भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशम भाव को देखने से पिता एवं राज्य द्वारा लाभ तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है, परन्तु सुख में कुछ कमी आती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने से माता के सुख में कमी होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु बढ़ती है। दसवीं शत्रु दृष्टि से एकादशभाव की देखने के कारण आमदनी के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं। राज्य के क्षेत्र में भी प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है।

१४४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों के साथ वैमनस्य रहता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। तीसरी मित्र- दृष्टि से पंचमभाव की देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव की देखने से भाग्य की अच्छी वृद्धि होती है। दसवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव की देखने के कारण खर्च में कमी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों में भी लापरवाही बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित होकर शनि के प्रभाव से जातक का माता के साथ वैमनस्य रहता है तथा भूमि-भवन के सुख में भी कमी रहती है। तीसरी उच्चदृष्टि से षष्ठभाव की देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा मामा से शक्ति मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव की देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव की देखने से शारीरिक प्रभाव एवं सम्मान में वृद्धि होती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में असंतोष रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आय के साधनों से असन्तोष रहता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव की देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त होती है। ऐसा जातक धनी, प्रतिष्ठित तथा भाग्यवान होता है।

१५५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभावः शनि छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर उच्चस्थ शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में विशेष प्रभावी रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ पाता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने के कारण आयु एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र में चिन्ता-मुक्त लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों से असन्तोषजनक सम्बन्ध रहता है तथा खर्च की भी परेशानी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है, पर भाई-बहिनों से मेल-मिलाप नहीं रहता। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभावः शनि सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता एवं उन्नति प्राप्त होती है, परन्तु कुटुम्ब के संचालन में कुछ कठिनाइयां बनी रहती हैं। पिता तथा राज्य से भी शक्ति प्राप्त होती है। तीसरी दृष्टि से नवमभाव की स्वराशि में देखने से भाग्यशक्ति बल- वान होती है तथा धर्म में भी रुचि रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि व भवन के सुख में कुछ कमी का अनुभव होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभावः शनि आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ दीर्घायु प्राप्त होती है। तीसरी दृष्टि से भाग्य, दशमभाव की देखने से पिता, राज्य एवं सम्मान के पक्ष में कुछ कमी रहती है। भाग्योन्नति के लिए बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण प्रयत्नपूर्वक धन का संचय होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव की देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक की आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।

१५६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव से जातक धर्मात्मा तथा भाग्यवान होता है, साथ ही उसे पिता तथा राज्य से भी श्रेष्ठ लाभ होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ गलत रास्तों से आमदनी में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु- दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से मनमुटाव रहता है। दसवीं उच्च दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव स्थापित होता है तथा माता से भी लाभ होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली से 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्नः दशमभाव : शनि दसवें भाव में स्वराशिस्य शनि के प्रभाव से जातक को पिता, व्यवसाय एवं राज्य द्वारा पर्याप्त लाभ होता है तथा प्रतिष्ठा मिलती है। तीसरी नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ त्रुटि रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में कमी आती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष भाग्यशाली होता है, परन्तु दैनिक जीवन में चिन्ताएँ रहती हैं। ऐसा जातक बड़ा भाग्यवान् तथा सफल व्यवसायी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की अपनी आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलताएँ मिलती हैं तथा पिता एवं राज्य-पक्ष से भी असन्तोषपूर्ण लाभ होता है। यों, भाग्य की शक्ति प्रबल रहती है। तीसरी मित्र दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक प्रभाव तथा आयु की शक्ति प्राप्त होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के विषय में कुछ कठिनाइयों का अनुभव होता है।

१५७ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : शनि बार‍हवें भाव में नीच राशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक को खर्च एवं बाहरी सम्बन्धों में परेशानियों का अनुभव होता है। राज्य, पिता, व्यवसाय, भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में भी कमियां रहती हैं। तीसरी मित्र- दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य साथ होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े-मुकदमे आदि में लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने से भाग्य की थोड़ी-बहुत वृद्धि होती है, परन्तु सम्मान के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। 'वृष' लग्न में 'राहु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ हानि होती है, परन्तु उसे गुप्त चतुराई एवं मनोबल द्वारा स्वार्थ-साधन में सफलता मिलती है। ऐसा जातक बड़ा साहसी तथा हिम्मती होता है। वह अनेक युक्तियों से अपने प्रभाव तथा व्यक्तित्व को बढ़ाने में सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे मूर्च्छा अथवा चोट का शिकार भी बनना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में स्थित उच्च के राहु के प्रभाव से जातक अनेक युक्तियों तथा चातुर्य के बल पर अपने धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि करता है, परन्तु बीच-बीच में उसे कठिनाइयों तथा संघर्षों का सामना भी करना पड़ता है। ३१०

१५८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि में स्थित राहु के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन तथा पराक्रम के क्षेत्र में कुछ कष्ट का अनुभव होता है, परन्तु वह अपनी भीतरी कमजोरियों तथा चिन्ताओं की बड़ी चतुराई से छिपाकर हौसला बनाये रखता है और प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती होता है। ३११ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कष्टों तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। परदेश में जाकर रहना पड़ता है तथा अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं, अन्त में कठिन परिश्रम तथा गुप्त उपायों द्वारा सामान्य धन एवं सुख प्राप्त करता है। ३१२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ सन्तान का सुख मिलता है तथा मस्तिष्क-सम्बन्धी कुछ कमियों के साथ विद्या एवं बुद्धि की उन्नति होती है। ऐसा जातक अधिक बोलने वाला, गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला तथा नशेबाज होता है। ३१३

१५६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष का हिम्मत के साथ मुकाबला करता और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है। परन्तु मामा के सुख में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा गुप्त विद्याओं में कुशल होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष द्वारा कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं। गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर वह थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है। उसे इन्द्रिय-विकारों का भी सामना करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक की आयु एवं पुरातत्व के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों तथा हानियों का सामना करना पड़ता है। परन्तु यह सौम्य तथा सज्जन बना रहता है। ऐसा जातक गुप्त चिन्ताओं से ग्रस्त हो, गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है तथा बाहरी सम्बन्धों से जीवन-निर्वाह करता है।

१६० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा धैर्य, गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम का आश्रय लेकर ही वह कुछ सफलताएँ प्राप्त करता है। उसके जीवन में सुख- दुःख तथा गरीबी-अमीरी का क्रम निरन्तर आता-जाता बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की अपने पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा सफलता पाने के लिए गुप्त युक्तियों, परिश्रम एवं धैर्य का आश्रय लेना पड़ता है। परन्तु ऊपरी दृष्टि से वह एक अमीर तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति जान पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से कुछ रुकावटों के साथ जातक की आमदनी के क्षेत्र में सफलताएँ प्राप्त होती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के द्वारा लाभ कमाता है। संकटों में भी वह अपना धैर्य नहीं खोता, अतः अन्त में उसे सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी भी बहुत होता है।

१६१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और चातुर्य तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ऊपरी दिखावे में ऐसा व्यक्ति सम्पन्न तथा प्रभावशाली प्रतीत होता है। कठिन परिश्रम के द्वारा उसे सफलताएँ भी मिलती हैं। 'वृष' लग्न में 'केतु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा मन में कुछ चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शारीरिक श्रम एवं योग्यता के बलबूते पर अन्य लोगों को प्रभावित भी करता है। उसके शरीर पर किसी घाव अथवा चोट का चिह्न भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के केतु के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब के मामले में अनेक चिन्ताओं तथा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कठिन परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों का सहारा लेकर धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में यत्किंचित् सफलता ही प्राप्त कर पाता है।

१६२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है तथा भाई-बहिनों के सम्बन्ध से भी कष्ट एवं हानि का सामना करना पड़ता है। परन्तु ऐसा जातक अपनी आन्तरिक दुर्बलता को छिपाये रखकर गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के सहारे अभावों को दूर करने में थोड़ी- बहुत सफलता भी पा लेता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा पारिवारिक सुख के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के सहारे जीवित रहता है। ऐसे व्यक्ति को स्वदेश त्याग कर परदेश में भी रहना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : पंचमभाव : केतु पांचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अपने साहस एवं गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलता भी प्राप्त कर लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा अपने मन्तव्य को प्रकट न करने वाला होता है।

१६३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर अपना विशेष प्रभाव स्थापित करने में समर्थ होता है तथा धैर्य, परिश्रम, गुप्त युक्ति, साहस आदि के बल पर समस्त विघ्न- बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है। वह बड़ा परिश्रमी, चतुर तथा धैर्यवान् होता है। मामा के पक्ष से कुछ हानि भी होती है।

'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को स्त्री के पक्ष में बहुत कष्ट तथा हानि का शिकार होना पड़ता है। वह मूत्राशय के रोगों से पीड़ित होता है। व्यवसाय तथा घरेलू जीवन के क्षेत्र में भी उसे कभी-कभी बड़ी असफलताएँ मिलती हैं, परन्तु वह अपने श्रम द्वारा कुछ शक्ति भी प्राप्त करता है।

'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व सम्बन्धी कोई विशेष लाभ होता है। वह जीवन-निर्वाह के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। वह अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली ढंग से व्यतीत करता है।

१६४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपने भाग्य की उन्नति करता है। धर्म में आस्था रखते हुए भी विशेष श्रद्धा नहीं दिखाता। संक्षेप में, ऐसा जातक धर्म का दिखावा न करने वाला, साहसी, परिश्रमी तथा गुप्त शक्तियों द्वारा काम लेने वाला होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में अपने मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पिता तथा राज्य के क्षेत्र में कुछ हानि उठानी पड़ती है। वह बड़े परिश्रम के साथ सामान्य सफलता प्राप्त करता है। वह ऊपरी दिखावे में अमीर, सुखी तथा सम्मानित प्रतीत होता है, परन्तु भीतर से कमजोरी बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपनी आमदनी के क्षेत्र में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके जीवन में कभी अच्छा लाभ होता है तो कभी विशेष संकट भी सामने आते हैं। ऐसा व्यक्ति साहसी तथा परिश्रमी होता है।

१६५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृष लग्न : द्वादश भाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानियाँ आती रहती हैं। ऐसा जातक बड़ा परिश्रमी, उद्योगी, धैर्यवान् तथा साहसी होता है।

१६६ मिथुन लग्न ४ ३ २ ५ 'मिथुन' लग्न १ ६ १२ ७ ९ ११ ८ १० ३३३ [ 'मिथुन' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन ] 'मिथुन' लग्न का फलादेश 'मिथुन' लग्न में जन्म लेने वाले जातक का चेहरा गोल तथा शरीर का रंग गेहुंआं होता है। वह नृत्य-वाद्य आदि संगीत की कलाओं का प्रेमी, कवि, हास्य-प्रवीण शिल्पज्ञ, विनम्र, परोपकारी, तीर्थप्रेमी, गणितज्ञ, द्यूत-कर्म करने में कुशल, ऐश्वर्य- शाली, धनी, सुखी, चतुर, मधुरभाषी, दानी, सुशील, विषयी, स्त्रियों में व्यासक्त, बहुमित्रवान्, बहु सन्ततिवान्, अनेक प्रकार के भोगों का उपभोग करने वाला, सुन्दर केशों वाला, राजा के समीप रहने वाला तथा राजा द्वारा ही पीड़ा प्राप्त करने वाला होता है। 'मिथुन' लग्न वाला जातक अपनी प्रारंभिक अवस्था में सुखी, मध्यमावस्था में दुःखी तथा अन्तिमावस्था में पुनः सुखोपभोग करने वाला होता है। उसका भाग्यो- दय ३२ से ३५ वर्ष की आयु के बीच होता है। इस लग्न वाला जातक मध्यम आयु प्राप्त करता है।

१६७ 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डलियों में संख्या ३३४ से ४४१ के बीच देखना चाहिए । गोचर कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए । 'मिथुन' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३३४ से ३४५ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश, निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर ही तो संख्या ३३४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३३५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३३६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३३७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३३८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३३६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३४० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर ही तो संख्या ३४१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३४२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३४३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३४४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३४५ 'मिथुन' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३४६ से ३५७ के बीच देखना चाहिए ।

१६८ २- 'मिथुन' लग्न वालों की गोचरकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३४६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३४७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३४८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३४९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३५० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३५१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३५२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३५३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३५४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३५५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३५६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३५७ 'मिथुन' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित मंगल का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३५८ से ३६९ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित मंगल का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३५८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३५९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३६० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३६१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३६२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३६३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३६४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३६५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३६६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३६७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३६८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३६९

१६६ 'मिथुन' लग्न में 'बुध' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३७० से ३८१ के बीच देखना चाहिए। २- 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३७० (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३७१ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३७२ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३७३ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३७४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३७५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३७६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३७७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३७८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३७९ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३८० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३८१ 'मिथुन' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वाले को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३८२ से ३९३ के बीच देखना चाहिए। २- 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३८२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३८३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३८४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३८५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३८६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३८७

१७० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३८८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३८९ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३९० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३९१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३९२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३९३ 'मिथुन' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३९४ से ४०५ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३९४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३९५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३९६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३९७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३९८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३९९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४०० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४०१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४०२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४०३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४०४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४०५ 'मिथुन' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४०६ से ४१७ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'

१७१ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४०६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४०७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४०८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४०६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४१० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४११ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४१२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर ही तो संख्या ४१३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४१४ (ञ) 'मकर' राशि पर ही तो संख्या ४१५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४१६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४१७ 'मिथुन' लग्न में 'राहु' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४१८ से ४२६ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४१८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४१९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४२० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४२१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४२२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४२३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४२४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४२५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४२६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४२७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४२८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४२६

१७२ ‘मिथुन’ लग्न में ‘केतु’ का फलादेश १. ‘मिथुन’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४३० से ४४१ के बीच देखना चाहिए। २. ‘मिथुन’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘केतु’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या ४३० (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या ४३१ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ४३२ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ४३३ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ४३४ (च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ४३५ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ४३७ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ४३८ (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ४४० (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ४४१ ‘मिथुन’ लग्न में ‘सूर्य’ ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित ‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक परम तेजस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा उद्योगी होता है। वह बड़े- बड़े काम करता है। शरीर पुष्ट होता है। उसे भाई-बहिनों का पर्याप्त सुख भी मिलता है। यहाँ से सूर्य द्वारा सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने के कारण जातक को व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में भी सफलता मिलती है तथा उसका गृहस्थ जीवन सुखी एवं स्नेहपूर्ण होता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा हिम्मती, फुर्तीला, क्रोधी तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी होता है।