भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१५८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि में स्थित राहु के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन तथा पराक्रम के क्षेत्र में कुछ कष्ट का अनुभव होता है, परन्तु वह अपनी भीतरी कमजोरियों तथा चिन्ताओं की बड़ी चतुराई से छिपाकर हौसला बनाये रखता है और प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती होता है। ३११ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कष्टों तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। परदेश में जाकर रहना पड़ता है तथा अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं, अन्त में कठिन परिश्रम तथा गुप्त उपायों द्वारा सामान्य धन एवं सुख प्राप्त करता है। ३१२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ सन्तान का सुख मिलता है तथा मस्तिष्क-सम्बन्धी कुछ कमियों के साथ विद्या एवं बुद्धि की उन्नति होती है। ऐसा जातक अधिक बोलने वाला, गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला तथा नशेबाज होता है। ३१३