भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

१५७ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : शनि बार‍हवें भाव में नीच राशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक को खर्च एवं बाहरी सम्बन्धों में परेशानियों का अनुभव होता है। राज्य, पिता, व्यवसाय, भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में भी कमियां रहती हैं। तीसरी मित्र- दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य साथ होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े-मुकदमे आदि में लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने से भाग्य की थोड़ी-बहुत वृद्धि होती है, परन्तु सम्मान के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। 'वृष' लग्न में 'राहु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ हानि होती है, परन्तु उसे गुप्त चतुराई एवं मनोबल द्वारा स्वार्थ-साधन में सफलता मिलती है। ऐसा जातक बड़ा साहसी तथा हिम्मती होता है। वह अनेक युक्तियों से अपने प्रभाव तथा व्यक्तित्व को बढ़ाने में सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे मूर्च्छा अथवा चोट का शिकार भी बनना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में स्थित उच्च के राहु के प्रभाव से जातक अनेक युक्तियों तथा चातुर्य के बल पर अपने धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि करता है, परन्तु बीच-बीच में उसे कठिनाइयों तथा संघर्षों का सामना भी करना पड़ता है। ३१०