भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
१५७ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में नीच राशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक को खर्च एवं बाहरी सम्बन्धों में परेशानियों का अनुभव होता है। राज्य, पिता, व्यवसाय, भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में भी कमियां रहती हैं। तीसरी मित्र- दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सामान्य साथ होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े-मुकदमे आदि में लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने से भाग्य की थोड़ी-बहुत वृद्धि होती है, परन्तु सम्मान के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। 'वृष' लग्न में 'राहु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ हानि होती है, परन्तु उसे गुप्त चतुराई एवं मनोबल द्वारा स्वार्थ-साधन में सफलता मिलती है। ऐसा जातक बड़ा साहसी तथा हिम्मती होता है। वह अनेक युक्तियों से अपने प्रभाव तथा व्यक्तित्व को बढ़ाने में सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे मूर्च्छा अथवा चोट का शिकार भी बनना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में स्थित उच्च के राहु के प्रभाव से जातक अनेक युक्तियों तथा चातुर्य के बल पर अपने धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि करता है, परन्तु बीच-बीच में उसे कठिनाइयों तथा संघर्षों का सामना भी करना पड़ता है। ३१०
१५८ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि में स्थित राहु के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन तथा पराक्रम के क्षेत्र में कुछ कष्ट का अनुभव होता है, परन्तु वह अपनी भीतरी कमजोरियों तथा चिन्ताओं की बड़ी चतुराई से छिपाकर हौसला बनाये रखता है और प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती होता है। ३११ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कष्टों तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। परदेश में जाकर रहना पड़ता है तथा अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं, अन्त में कठिन परिश्रम तथा गुप्त उपायों द्वारा सामान्य धन एवं सुख प्राप्त करता है। ३१२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ सन्तान का सुख मिलता है तथा मस्तिष्क-सम्बन्धी कुछ कमियों के साथ विद्या एवं बुद्धि की उन्नति होती है। ऐसा जातक अधिक बोलने वाला, गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला तथा नशेबाज होता है। ३१३
१५६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष का हिम्मत के साथ मुकाबला करता और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है। परन्तु मामा के सुख में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा गुप्त विद्याओं में कुशल होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष द्वारा कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं। गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर वह थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है। उसे इन्द्रिय-विकारों का भी सामना करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक की आयु एवं पुरातत्व के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों तथा हानियों का सामना करना पड़ता है। परन्तु यह सौम्य तथा सज्जन बना रहता है। ऐसा जातक गुप्त चिन्ताओं से ग्रस्त हो, गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है तथा बाहरी सम्बन्धों से जीवन-निर्वाह करता है।
१६० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा धैर्य, गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम का आश्रय लेकर ही वह कुछ सफलताएँ प्राप्त करता है। उसके जीवन में सुख- दुःख तथा गरीबी-अमीरी का क्रम निरन्तर आता-जाता बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की अपने पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा सफलता पाने के लिए गुप्त युक्तियों, परिश्रम एवं धैर्य का आश्रय लेना पड़ता है। परन्तु ऊपरी दृष्टि से वह एक अमीर तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति जान पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से कुछ रुकावटों के साथ जातक की आमदनी के क्षेत्र में सफलताएँ प्राप्त होती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के द्वारा लाभ कमाता है। संकटों में भी वह अपना धैर्य नहीं खोता, अतः अन्त में उसे सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी भी बहुत होता है।
१६१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और चातुर्य तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ऊपरी दिखावे में ऐसा व्यक्ति सम्पन्न तथा प्रभावशाली प्रतीत होता है। कठिन परिश्रम के द्वारा उसे सफलताएँ भी मिलती हैं। 'वृष' लग्न में 'केतु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा मन में कुछ चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शारीरिक श्रम एवं योग्यता के बलबूते पर अन्य लोगों को प्रभावित भी करता है। उसके शरीर पर किसी घाव अथवा चोट का चिह्न भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के केतु के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब के मामले में अनेक चिन्ताओं तथा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कठिन परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों का सहारा लेकर धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में यत्किंचित् सफलता ही प्राप्त कर पाता है।
१६२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है तथा भाई-बहिनों के सम्बन्ध से भी कष्ट एवं हानि का सामना करना पड़ता है। परन्तु ऐसा जातक अपनी आन्तरिक दुर्बलता को छिपाये रखकर गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के सहारे अभावों को दूर करने में थोड़ी- बहुत सफलता भी पा लेता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा पारिवारिक सुख के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के सहारे जीवित रहता है। ऐसे व्यक्ति को स्वदेश त्याग कर परदेश में भी रहना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : पंचमभाव : केतु पांचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अपने साहस एवं गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलता भी प्राप्त कर लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा अपने मन्तव्य को प्रकट न करने वाला होता है।
१६३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर अपना विशेष प्रभाव स्थापित करने में समर्थ होता है तथा धैर्य, परिश्रम, गुप्त युक्ति, साहस आदि के बल पर समस्त विघ्न- बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है। वह बड़ा परिश्रमी, चतुर तथा धैर्यवान् होता है। मामा के पक्ष से कुछ हानि भी होती है।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को स्त्री के पक्ष में बहुत कष्ट तथा हानि का शिकार होना पड़ता है। वह मूत्राशय के रोगों से पीड़ित होता है। व्यवसाय तथा घरेलू जीवन के क्षेत्र में भी उसे कभी-कभी बड़ी असफलताएँ मिलती हैं, परन्तु वह अपने श्रम द्वारा कुछ शक्ति भी प्राप्त करता है।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व सम्बन्धी कोई विशेष लाभ होता है। वह जीवन-निर्वाह के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। वह अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली ढंग से व्यतीत करता है।
१६४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपने भाग्य की उन्नति करता है। धर्म में आस्था रखते हुए भी विशेष श्रद्धा नहीं दिखाता। संक्षेप में, ऐसा जातक धर्म का दिखावा न करने वाला, साहसी, परिश्रमी तथा गुप्त शक्तियों द्वारा काम लेने वाला होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में अपने मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पिता तथा राज्य के क्षेत्र में कुछ हानि उठानी पड़ती है। वह बड़े परिश्रम के साथ सामान्य सफलता प्राप्त करता है। वह ऊपरी दिखावे में अमीर, सुखी तथा सम्मानित प्रतीत होता है, परन्तु भीतर से कमजोरी बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपनी आमदनी के क्षेत्र में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके जीवन में कभी अच्छा लाभ होता है तो कभी विशेष संकट भी सामने आते हैं। ऐसा व्यक्ति साहसी तथा परिश्रमी होता है।
१६५ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृष लग्न : द्वादश भाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानियाँ आती रहती हैं। ऐसा जातक बड़ा परिश्रमी, उद्योगी, धैर्यवान् तथा साहसी होता है।
१६६ मिथुन लग्न ४ ३ २ ५ 'मिथुन' लग्न १ ६ १२ ७ ९ ११ ८ १० ३३३ [ 'मिथुन' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन ] 'मिथुन' लग्न का फलादेश 'मिथुन' लग्न में जन्म लेने वाले जातक का चेहरा गोल तथा शरीर का रंग गेहुंआं होता है। वह नृत्य-वाद्य आदि संगीत की कलाओं का प्रेमी, कवि, हास्य-प्रवीण शिल्पज्ञ, विनम्र, परोपकारी, तीर्थप्रेमी, गणितज्ञ, द्यूत-कर्म करने में कुशल, ऐश्वर्य- शाली, धनी, सुखी, चतुर, मधुरभाषी, दानी, सुशील, विषयी, स्त्रियों में व्यासक्त, बहुमित्रवान्, बहु सन्ततिवान्, अनेक प्रकार के भोगों का उपभोग करने वाला, सुन्दर केशों वाला, राजा के समीप रहने वाला तथा राजा द्वारा ही पीड़ा प्राप्त करने वाला होता है। 'मिथुन' लग्न वाला जातक अपनी प्रारंभिक अवस्था में सुखी, मध्यमावस्था में दुःखी तथा अन्तिमावस्था में पुनः सुखोपभोग करने वाला होता है। उसका भाग्यो- दय ३२ से ३५ वर्ष की आयु के बीच होता है। इस लग्न वाला जातक मध्यम आयु प्राप्त करता है।
१६७ 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डलियों में संख्या ३३४ से ४४१ के बीच देखना चाहिए । गोचर कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए । 'मिथुन' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३३४ से ३४५ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश, निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर ही तो संख्या ३३४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३३५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३३६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३३७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३३८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३३६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३४० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर ही तो संख्या ३४१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३४२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३४३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३४४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३४५ 'मिथुन' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३४६ से ३५७ के बीच देखना चाहिए ।
१६८ २- 'मिथुन' लग्न वालों की गोचरकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३४६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३४७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३४८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३४९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३५० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३५१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३५२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३५३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३५४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३५५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३५६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३५७ 'मिथुन' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित मंगल का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३५८ से ३६९ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित मंगल का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३५८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३५९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३६० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३६१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३६२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३६३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३६४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३६५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३६६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३६७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३६८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३६९
१६६ 'मिथुन' लग्न में 'बुध' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३७० से ३८१ के बीच देखना चाहिए। २- 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३७० (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३७१ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३७२ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३७३ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३७४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३७५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३७६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३७७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३७८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३७९ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३८० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३८१ 'मिथुन' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वाले को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३८२ से ३९३ के बीच देखना चाहिए। २- 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३८२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३८३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३८४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३८५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३८६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३८७
१७० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ३८८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ३८९ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ३९० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ३९१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ३९२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ३९३ 'मिथुन' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ३९४ से ४०५ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ३९४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ३९५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ३९६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ३९७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ३९८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ३९९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४०० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४०१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४०२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४०३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४०४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४०५ 'मिथुन' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४०६ से ४१७ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
१७१ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४०६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४०७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४०८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४०६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४१० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४११ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४१२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर ही तो संख्या ४१३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४१४ (ञ) 'मकर' राशि पर ही तो संख्या ४१५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४१६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४१७ 'मिथुन' लग्न में 'राहु' का फलादेश १- 'मिथुन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४१८ से ४२६ के बीच देखना चाहिए। २. 'मिथुन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४१८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४१९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४२० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४२१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४२२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४२३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४२४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४२५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४२६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४२७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४२८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४२६
१७२ ‘मिथुन’ लग्न में ‘केतु’ का फलादेश १. ‘मिथुन’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४३० से ४४१ के बीच देखना चाहिए। २. ‘मिथुन’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘केतु’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या ४३० (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या ४३१ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ४३२ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ४३३ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ४३४ (च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ४३५ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ४३७ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ४३८ (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ४४० (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ४४१ ‘मिथुन’ लग्न में ‘सूर्य’ ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित ‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक परम तेजस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा उद्योगी होता है। वह बड़े- बड़े काम करता है। शरीर पुष्ट होता है। उसे भाई-बहिनों का पर्याप्त सुख भी मिलता है। यहाँ से सूर्य द्वारा सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने के कारण जातक को व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में भी सफलता मिलती है तथा उसका गृहस्थ जीवन सुखी एवं स्नेहपूर्ण होता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा हिम्मती, फुर्तीला, क्रोधी तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी होता है।
१७३ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीय भाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम द्वारा धन तथा कुटुम्ब के सुख को बढ़ाता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ न्यूनता रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव के देखने से जातक को पुरातत्व के लाभ में कमी रहती है तथा दैनिक जीवन में भी कुछ अशांति बनी रहती है। ऐसी ग्रहस्थिति का जातक धनी तथा हिम्मती होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीय भाव : सूर्य तीसरे भाव में स्वराशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की पूर्ण शक्ति मिलती है तथा वह अत्यन्त पराक्रमी भी होत है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक के भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी आ जाती है। सामान्यतः ऐसी ग्रह- स्थिति वाला जातक बड़ा पराक्रमी, प्रभावशाली तथा सुखी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : चतुर्थ भाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। साथ ही माता, भूमि, भवन, संपत्ति एवं सुख का भी लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा प्रभावशाली होता है।
१७४ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की विद्या-बुद्धि में कमी रहती है तथा सन्तान से कष्ट मिलता है। पराक्रम में भी कमजोरी रहती है। सातवीं उच्चदृष्टि से मित्रराशिस्थ एका- दश भाव को देखने के कारण जातक गुप्त युक्तियों तथा असत्य-भाषण आदि का आश्रय लेकर धन कमाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर विजय पाता है। भाई-बहिनों के साथ कुछ वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने के कारण खर्च की अधिकता रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी कोई अधिक सुख नहीं मिलता। ऐसा व्यक्ति साहसी तथा कठिन परि- श्रमी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को स्त्री से सुख, शक्ति एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है तथा परिश्रम द्वारा व्यवसाय में भी अच्छा लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने के कारण जातक को शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव का लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति का गार्हस्थ्य-जीवन सुखमय होता है।
१७५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व एवं आयु के क्षेत्र में कमी आती है तथा भाई-बहिन का सुख एवं पराक्रम भी न्यून रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण आर्थिक क्षेत्र में परिश्रम से लाभ होता है तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। ३४१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा भाग्य की उन्नति करता है तथा धर्म-पालन में उदासीन- सा रहता है। भाई-बहिनों से सम्बन्ध भी सन्तोष- जनक नहीं रहता। सातवीं मित्रदृष्टि से स्वराशि वाले तृतीय भाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई के द्वारा थोड़ा सहयोग भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी, उद्योगी तथा तेजस्वी होता है। ३४२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पिता की अच्छी शक्ति मिलती है तथा राज्य एवं व्यवसाय से भी लाभ तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भूमि, भवन, सुख एवं मातृ-पक्ष में सफलता मिलती है। ऐसा जातक सुखी एवं सन्तुष्ट रहता है। ३४३
१७६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में उच्च राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक का पराक्रम बढ़ा रहता है और वह यथेष्ट लाभ प्राप्त करता है। भाई-बहिन के सुख में भी वृद्धि होती है। सातवीं नीचदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने के कारण सन्तान-पक्ष में कुछ कमी आती है तथा विद्या- लाभ में भी रुकावटें पड़ती हैं। ऐसा व्यक्ति रूखे स्वभाव का तथा अत्यन्त परिश्रमी और साहसी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी भीतरी कमजोरी को दबाकर, ऊपर से बड़ी हिम्मत दिखाता है तथा परिश्रमी होता है। 'मिथुन' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपनी शारीरिक शक्ति तथा मनोबल से धनोपार्जन करता है तथा पर्याप्त कौटुम्बिक सुख भी भोगता है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में भी पर्याप्त सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है।