भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ ‘मिथुन’ लग्न में ‘केतु’ का फलादेश १. ‘मिथुन’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४३० से ४४१ के बीच देखना चाहिए। २. ‘मिथुन’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘केतु’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या ४३० (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या ४३१ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ४३२ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ४३३ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ४३४ (च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ४३५ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ४३७ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ४३८ (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ४४० (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ४४१ ‘मिथुन’ लग्न में ‘सूर्य’ ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित ‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक परम तेजस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा उद्योगी होता है। वह बड़े- बड़े काम करता है। शरीर पुष्ट होता है। उसे भाई-बहिनों का पर्याप्त सुख भी मिलता है। यहाँ से सूर्य द्वारा सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने के कारण जातक को व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में भी सफलता मिलती है तथा उसका गृहस्थ जीवन सुखी एवं स्नेहपूर्ण होता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा हिम्मती, फुर्तीला, क्रोधी तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी होता है।