भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
१७२ ‘मिथुन’ लग्न में ‘केतु’ का फलादेश १. ‘मिथुन’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४३० से ४४१ के बीच देखना चाहिए। २. ‘मिथुन’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘केतु’ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में ‘केतु’— (क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या ४३० (ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या ४३१ (ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ४३२ (घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ४३३ (ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ४३४ (च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ४३५ (छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ४३७ (झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ४३८ (ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ४३६ (ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ४४० (ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ४४१ ‘मिथुन’ लग्न में ‘सूर्य’ ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘सूर्य’ का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित ‘सूर्य’ के प्रभाव से जातक परम तेजस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा उद्योगी होता है। वह बड़े- बड़े काम करता है। शरीर पुष्ट होता है। उसे भाई-बहिनों का पर्याप्त सुख भी मिलता है। यहाँ से सूर्य द्वारा सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने के कारण जातक को व्यवसाय एवं स्त्री-पक्ष में भी सफलता मिलती है तथा उसका गृहस्थ जीवन सुखी एवं स्नेहपूर्ण होता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक बड़ा हिम्मती, फुर्तीला, क्रोधी तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी होता है।
१७३ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीय भाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम द्वारा धन तथा कुटुम्ब के सुख को बढ़ाता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ न्यूनता रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव के देखने से जातक को पुरातत्व के लाभ में कमी रहती है तथा दैनिक जीवन में भी कुछ अशांति बनी रहती है। ऐसी ग्रहस्थिति का जातक धनी तथा हिम्मती होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीय भाव : सूर्य तीसरे भाव में स्वराशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की पूर्ण शक्ति मिलती है तथा वह अत्यन्त पराक्रमी भी होत है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक के भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी आ जाती है। सामान्यतः ऐसी ग्रह- स्थिति वाला जातक बड़ा पराक्रमी, प्रभावशाली तथा सुखी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : चतुर्थ भाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। साथ ही माता, भूमि, भवन, संपत्ति एवं सुख का भी लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा प्रभावशाली होता है।
१७४ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की विद्या-बुद्धि में कमी रहती है तथा सन्तान से कष्ट मिलता है। पराक्रम में भी कमजोरी रहती है। सातवीं उच्चदृष्टि से मित्रराशिस्थ एका- दश भाव को देखने के कारण जातक गुप्त युक्तियों तथा असत्य-भाषण आदि का आश्रय लेकर धन कमाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर विजय पाता है। भाई-बहिनों के साथ कुछ वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने के कारण खर्च की अधिकता रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी कोई अधिक सुख नहीं मिलता। ऐसा व्यक्ति साहसी तथा कठिन परि- श्रमी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को स्त्री से सुख, शक्ति एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है तथा परिश्रम द्वारा व्यवसाय में भी अच्छा लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने के कारण जातक को शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव का लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति का गार्हस्थ्य-जीवन सुखमय होता है।
१७५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व एवं आयु के क्षेत्र में कमी आती है तथा भाई-बहिन का सुख एवं पराक्रम भी न्यून रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण आर्थिक क्षेत्र में परिश्रम से लाभ होता है तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। ३४१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा भाग्य की उन्नति करता है तथा धर्म-पालन में उदासीन- सा रहता है। भाई-बहिनों से सम्बन्ध भी सन्तोष- जनक नहीं रहता। सातवीं मित्रदृष्टि से स्वराशि वाले तृतीय भाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई के द्वारा थोड़ा सहयोग भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी, उद्योगी तथा तेजस्वी होता है। ३४२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पिता की अच्छी शक्ति मिलती है तथा राज्य एवं व्यवसाय से भी लाभ तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भूमि, भवन, सुख एवं मातृ-पक्ष में सफलता मिलती है। ऐसा जातक सुखी एवं सन्तुष्ट रहता है। ३४३
१७६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में उच्च राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक का पराक्रम बढ़ा रहता है और वह यथेष्ट लाभ प्राप्त करता है। भाई-बहिन के सुख में भी वृद्धि होती है। सातवीं नीचदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने के कारण सन्तान-पक्ष में कुछ कमी आती है तथा विद्या- लाभ में भी रुकावटें पड़ती हैं। ऐसा व्यक्ति रूखे स्वभाव का तथा अत्यन्त परिश्रमी और साहसी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी भीतरी कमजोरी को दबाकर, ऊपर से बड़ी हिम्मत दिखाता है तथा परिश्रमी होता है। 'मिथुन' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपनी शारीरिक शक्ति तथा मनोबल से धनोपार्जन करता है तथा पर्याप्त कौटुम्बिक सुख भी भोगता है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में भी पर्याप्त सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है।
१७७ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में स्वराशि में स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक को दैनिक जीवन में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की भी हानि होती है। मानसिक रूप से चिन्तित रहते हुए भी ऐसा जातक सुखी तथा यशस्वी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में रुकावटें आती हैं तथा धर्म का पक्ष भी कमजोर रहता है। ऐसा जातक धनी, प्रतिष्ठित तथा यशस्वी होता है। वह धर्म को विशेष महत्त्व नहीं देता। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी आती है परन्तु भूमि, भवन, सम्पत्ति एवं कुटुम्ब का सुख खूब मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य के द्वारा भी सुख तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक धनी, सुखी, प्रभावशाली तथा व्यवसाय में सफलता पाने वाला होता है।
१७८ ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली के ‘पंचमभाव’ स्थित ‘चन्द्रमा’ का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष में कुछ रुकावटें आती हैं, परन्तु विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण आमदनी अच्छी रहती है। ऐसा जातक सुखी, धनी, चतुर तथा प्रतिष्ठित होता है। ‘मिथुन’ लग्न को कुण्डली के ‘षष्ठभाव’ स्थित ‘चन्द्रमा’ का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा धनोपार्जन करता है तथा शत्रु-पक्ष द्वारा भी चोट खा सकता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्पर्क से लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति धन कमाने के विषय में अपयशी होता है। ‘मिथुन’ लग्न को कुण्डली के ‘सप्तमभाव’ स्थित ‘चन्द्रमा’ का फलादेश मिथुन लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में कुछ रुकावटों के साथ सफलता मिलती है तथा विवाह के बाद भाग्योन्नति होती है। व्यवसाय एवं भोगादि का पर्याप्त सुख भी तभी मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक का शरीर सुन्दर होता है और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है।
१७६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व के पक्ष में परेशानी रहती है तथा धन एवं कुटुम्ब के सुख में भी बाधा आती है। दैनिक जीवन में भी परेशानियाँ रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब की उन्नति के साधन प्राप्त होते रहते हैं तथा उनकी प्राप्ति के लिए विशेष परिश्रम भी करना पड़ता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक धन की वृद्धि के लिए धर्म का पालन करता है तथा भाग्य-पक्ष में कुछ असन्तोष के साथ लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण जातक को भाई-बहिनों का सुख प्राप्त होता है तथा उसके पराक्रम में भी वृद्धि होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को पिता तथा राज्य द्वारा सहयोग, सुख, धन एवं प्रतिष्ठा आदि का लाभ होता है तथा व्यवसाय की उन्नति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण जातक को माता, भूमि, भवन एवं घरेलू-सुखों का भी लाभ होता है, परन्तु धन की उन्नति में कुछ अटकाव सा अनुभव होता है।
१८० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा से जातक को धन का पर्याप्त लाभ होता है तथा कौटुम्बिक सुख भी मिलता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पर्याप्त सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति विद्वान्, बुद्धिमान्, सन्ततिवान् धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में उच्चस्थ चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता रहता है। कुटुम्ब की शक्ति में कुछ कमी आती है। सातवीं नीचदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष में स्वयं झुक कर अपना काम निकालना पड़ता है तथा रोग, झगड़े आदि के कारण मन में थोड़ी-बहुत अशान्ति भी बनी रहती है। 'मिथुन' लग्न में 'मंगल' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक अपने शारीरिक श्रम द्वारा यथेष्ट धन कमाता है तथा शत्रुपक्ष में भी विजयी होता है चौथी मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता तथा घरेलू सुख का असन्तोषपूर्ण लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री को रोग तथा परेशानियां रहती हैं, परिश्रम द्वारा व्यवसाय से लाभ होता है। सातवीं उच्चदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी तथा झगड़ालू होता है।
१८१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : द्वितीयभाव : मंगल \qquad दूसरे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब को हानि उठानी पड़ती है। शत्रुपक्ष भी नुकसान पहुँचाता है। जुए-सट्टे में भी हानि होती है। चौथी दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान पक्ष में कमी रहती है तथा विद्या-बुद्धि का लाभ भी गुप्त युक्तियों से होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। आठवीं शत्रु- दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म में रुचि नहीं होती तथा भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली से 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : तृतीयभाव : मंगल \qquad तीसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का सुख कुछ परेशानी के साथ मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर विजय मिलती है तथा शत्रुओं से लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म का सामान्य लाभ होता है। आठवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण राज्य तथा पिता के पक्ष से यश, धन आदि का लाभ होता है तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : चतुर्थभाव : मंगल \qquad चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता से सामान्य वैमनस्ययुक्त लाभ होता है तथा भूमि, भवन एवं घरेलू सुख भी कुछ कठिनाइयों के साथ ही मिलता है। चौथी मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में सामान्य परेशानियां रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य द्वारा यश एवं लाभ मिलता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से जातक की आमदनी अच्छी रहती है।
१८२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष द्वारा कुछ वैमनस्य के साथ लाभ होता है तथा परिश्रम द्वारा विद्या-बुद्धि प्राप्त होती है। चौथी उच्चदृष्टि से आयु-वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादशभाव को देखने से गुप्त युक्तियों एवं परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ होता है। आठवीं दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : षष्ठभाव : मंगल छठें भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को शत्रुपक्ष पर विशेष सफलता मिलती है और शत्रु, झगड़े-टंटे तथा मामा के द्वारा लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक शारीरिक परिश्रम खूब करता है तथा उसी से धन भी कमाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तम भाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को व्यावसायिक तथा स्त्री- पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। चौथी मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता तथा राज्यपक्ष से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है, परन्तु रक्त-विकार आदि रोग भी हो सकते हैं। आठवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन-संचय में कमी रहती है तथा कुटुम्ब के कारण क्लेश भी मिलता है।
१८३ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि में उच्चस्थ मंगल के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व का लाभ होता है तथा शत्रुपक्ष पर कुछ कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले एकादश भाव को देखने से परिश्रम द्वारा लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव के जातक की भाग्योन्नति में कुछ कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म-पालन में भी विशेष रुचि नहीं होती। शत्रुपक्ष में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। चौथी दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च की अधिकता तथा बाह्य स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। आठवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख भी कुछ कठिनाइयों के बाद पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम द्वारा राज्य तथा पिता के क्षेत्र में यश और लाभ कमाता है तथा शत्रुपक्ष पर अपना विशेष प्रभाव बनाये रखता है। चौथी मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि द्वारा चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा घरेलू सुख में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। आठवीं मित्र- दृष्टि से सन्तान-पक्ष द्वारा वैमनस्ययुक्त लाभ होता है तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता मिलती है। इसकी आमदनी बहुत अच्छी रहती है।
१८४ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन का स्थायी लाभ होता है। चौथी नीचदृष्टि द्वारा द्वितीयभाव को देखने से धन का संचय नहीं होता तथा कौटुम्बिक मामलों में भी कष्ट होता है। सातवीं दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष द्वारा त्रुटिपूर्ण लाभ होता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। आठवीं दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर जातक का प्रभाव बना रहता है तथा उनसे लाभ भी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। चौथी मित्रदृष्टि से तृतीयभाव- को देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों से द्वारा भी कुछ परेशानियों के बाद लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठ- भाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष से कभी हानि होती है और कभी लाभ होता है तथा माता का पक्ष कमजोर रहता है। आठवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ परेशानी रहती है तथा जननेन्द्रिय सम्बन्धी कोई रोग भी हो सकता है। 'मिथुन' लग्न में 'बुध' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुनलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि में स्थित बुध के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख भी पर्याप्त परिमाण में उपलब्ध रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से विशेष सुख मिलता है तथा व्यावसायिक क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, शान्त, बुद्धिमान् तथा प्रत्येक क्षेत्र में सफलता पाने वाला होता है।
१८४ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि में स्थित बुध के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख तो प्राप्त होता है, परन्तु शारीरिक एवं माता के सुख में कमी रहती है। भूमि, भवन तथा सम्पत्ति का सुख अच्छा मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। ३७१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। माता, भूमि एवं भवन का भी अच्छा सुख रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने [
१८६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : पंचमभाव : बुध [कुण्डली ३७४ : मिथुन लग्न, पंचम भाव (तुला राशि) में बुध] पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है और वह बड़ा गंभीर, चतुर तथा आत्मविश्वासी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण बुद्धि-बल से पर्याप्त लाभ होता रहता है। साथ ही माता, भूमि एवं भवन का सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति शान्ति-प्रिय स्वभाव का होता है। 'मिथुन' लग्न को कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : षष्ठभाव : बुध [कुण्डली ३७५ : मिथुन लग्न, षष्ठ भाव (वृश्चिक राशि) में बुध] छठे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
१८७ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है, पर माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य की भी हानि होती है। ऐसे व्यक्ति को अपने जन्म-स्थान से हट कर परदेश में जाकर रहना पड़ता है। सातवी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण प्रयत्नपूर्वक धन एवं कुटुम्ब के सुख का लाभ होता है, परन्तु शारीरिक सुख में कमी रहती है तथा परेशानियां भी उठानी पड़ती हैं। 'मिथुन' जन्म की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित' बुध के प्रभाव से जातक अपने शारीरिक परिश्रम तथा विवेक द्वारा धर्म एवं भाग्य की उन्नति करता है। उसे माता, भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त होता है। सातवीं मित्र दृष्टि से तृतीय भाव को देखने के कारण जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का अच्छा सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, यशस्वी, सन्तुष्ट तथा विवेकी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में स्थित नीच के बुध के प्रभाव से जातक को अपनी उन्नति के लिए कठोर शारीरिक श्रम करना पड़ता है। पिता का अल्प- सुख मिलता है तथा राज्य के क्षेत्र में भी अधिक सफलता नहीं मिलती। सातवी उच्चदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शारीरिक स्वास्थ्य और सुख के सातवीं में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति कभी अपमानित और कभी सम्मानित होता रहता है।
१८८ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक स्व-विवेक एवं शारीरिक परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ उठाता है। उसे माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने के कारण विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा सन्तान-पक्ष से लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति सुखी, सुन्दर, मधुर- भाषी, धनी तथा विवेकी होता है। 'मिथुन' लग्न को कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश बारहवें भाव में मित्र शुक्र का राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। माता, मिथुन लग्न : द्वादशभाव : बुध भूमि तथा मकान के सुख में भी कमी रहती है। जातक को अपनी जन्म-भूमि से दूर रहने पर लाभ एवं सुख मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष में विवेक एवं शांति द्वारा सफलता मिलती है। खर्च के कारण भीतरी चिंताएँ रहते हुए भी वह अपने ऊपरी प्रभाव को बनाये रखता है। 'मिथुन' लग्न में 'गुरु' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को सुख, शारीरिक सौन्दर्य, स्वाभिमान तथा मनोबल की प्राप्ति होती है। पिता तथा राज्य से भी लाभ होता है। मिथुन लग्न : प्रथमभाव : गुरु पाँचवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री का सुख अच्छा रहता है तथा नवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव की देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है।
२. द्वितीय खण्ड: तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चम भावस्थ ग्रह-योग एवं विद्या-संतान विचार
१८६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश दूसरे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित उच्च के गुरु के प्रभाव मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : गुरु से जातक के धन-कुटुम्ब को वृद्धि होती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर प्रभाव एवं विजय की प्राप्ति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के लाभ में कमी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य के द्वारा सहयोग तथा सफलताएँ मिलती हैं तथा व्यवसाय द्वारा धन की पर्याप्त वृद्धि होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तीसरे भाव में सूर्य की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के पराक्रम मिथुन लग्न : तृतीयभाव : गुरु एवं भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से श्रेष्ठ पत्नी द्वारा सुख प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है तथा धन-प्राप्ति के लिए परिश्रम अधिक करना पड़ता है, परन्तु नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण आमदनी अच्छी रहती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : गुरु माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख पर्याप्त मिलता है। पाँचवीं नीचदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में अशांति तथा कुछ कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव को देखने से पिता तथा राज्य-पक्ष से सहयोग, यश एवं लाभ प्राप्त होता है नवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ लाभ भी होता है।
१६० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश पाँचवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को विद्या- मिथुन लग्न : पंचमभाव : गुरु बुद्धि के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमजोरी रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने के कारण भाग्योन्नति कुछ कठिनाइयों के साथ होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है तथा नवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने के कारण जातक को श्रेष्ठ शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं स्वाभिमान की प्राप्ति होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश छठे भाव में मित्र मङ्गल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विजय प्राप्त होती है परन्तु स्त्री-पक्ष से कुछ मतभेद रहता है। मिथुन लग्न : षष्ठभाव : गुरु पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव को देखने से राज्य द्वारा सम्मान तथा उन्नति के अवसर मिलते हैं, परन्तु पिता से कुछ मतभेद रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। नवीं उच्च दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से परिश्रम द्वारा धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब से भी सहयोग मिलता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सातवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय मिथुन लग्न : सप्तमभाव : गुरु के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। पिता तथा राज्य के क्षेत्र से भी सहयोग तथा सम्मान मिलता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। नवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा संपन्न होता है।
१६१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष से भी कष्ट होता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश- मिथुन लग्न : अष्टमभाव : गुरु भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से कपटपूर्ण सम्बन्ध द्वारा काम चलता है। सातवीं उच्चदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से परिश्रम के द्वारा धन की कुछ वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन आदि का सामान्य सुख प्राप्त होता है। ३८८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की उन्नति मिथुन लग्न : नवमभाव : गुरु करता है। पिता, राज्य तथा स्त्री-पक्ष से असंतोष रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों का सुख बढ़ता है। नवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष से असन्तोष रहता है। ३८९
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश दसवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को राज्य एवं पिता से पूर्ण सहयोग, सुख तथा सम्मान मिलता है। व्यवसाय मिथुन लग्न : दशमभाव : गुरु में भी सफलता मिलती है। पाँचवीं उच्चदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन का संचय भी अच्छा होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा सम्पत्ति का सुख भी खूब मिलता है। नवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ- भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति हर प्रकार से सुखी रहता है। ३९०