भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१६१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष से भी कष्ट होता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश- मिथुन लग्न : अष्टमभाव : गुरु भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से कपटपूर्ण सम्बन्ध द्वारा काम चलता है। सातवीं उच्चदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से परिश्रम के द्वारा धन की कुछ वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन आदि का सामान्य सुख प्राप्त होता है। ३८८


'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की उन्नति मिथुन लग्न : नवमभाव : गुरु करता है। पिता, राज्य तथा स्त्री-पक्ष से असंतोष रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों का सुख बढ़ता है। नवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष से असन्तोष रहता है। ३८९


'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश दसवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को राज्य एवं पिता से पूर्ण सहयोग, सुख तथा सम्मान मिलता है। व्यवसाय मिथुन लग्न : दशमभाव : गुरु में भी सफलता मिलती है। पाँचवीं उच्चदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन का संचय भी अच्छा होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा सम्पत्ति का सुख भी खूब मिलता है। नवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ- भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा व्यक्ति हर प्रकार से सुखी रहता है। ३९०