भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक मिथुन लग्न : एकादशभाव : गुरु को श्रेष्ठ लाभ होता है तथा पिता, व्यवसाय एवं राज्य से भी सहयोग मिलता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि में तो वृद्धि होती है परन्तु सन्तान- पक्ष कमजोर रहता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय- पक्ष से पर्याप्त लाभ एवं सुख मिलता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश बारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का मिथुन लग्न : द्वादशभाव : गुरु खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश तथा लाभ मिलता है। स्त्री तथा पिता के सुख में कुछ कमी रहती है तथा व्यवसाय में भी हानि होती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के विजय में संकटों का सामना करना पड़ता है। 'मिथुन' लग्न में 'शुक्र' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक शरीर मिथुन लग्न : प्रथमभाव : शुक्र से दुर्बल परन्तु विद्या, बुद्धि एवं चातुर्य में प्रवीण होता है। वह खर्चीला तथा बाहरी स्थानों से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री के साथ मतभेदपूर्ण आसक्ति बनी रहती है। दैनिक कार्यों तथा व्यवसाय में बड़ी युक्ति के साथ सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति बहुत विलासी होता है।