भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश पाँचवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को विद्या- मिथुन लग्न : पंचमभाव : गुरु बुद्धि के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमजोरी रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने के कारण भाग्योन्नति कुछ कठिनाइयों के साथ होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है तथा नवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने के कारण जातक को श्रेष्ठ शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं स्वाभिमान की प्राप्ति होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश छठे भाव में मित्र मङ्गल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विजय प्राप्त होती है परन्तु स्त्री-पक्ष से कुछ मतभेद रहता है। मिथुन लग्न : षष्ठभाव : गुरु पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव को देखने से राज्य द्वारा सम्मान तथा उन्नति के अवसर मिलते हैं, परन्तु पिता से कुछ मतभेद रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। नवीं उच्च दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से परिश्रम द्वारा धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब से भी सहयोग मिलता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सातवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय मिथुन लग्न : सप्तमभाव : गुरु के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। पिता तथा राज्य के क्षेत्र से भी सहयोग तथा सम्मान मिलता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। नवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा संपन्न होता है।