भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष द्वारा कुछ वैमनस्य के साथ लाभ होता है तथा परिश्रम द्वारा विद्या-बुद्धि प्राप्त होती है। चौथी उच्चदृष्टि से आयु-वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले एकादशभाव को देखने से गुप्त युक्तियों एवं परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ होता है। आठवीं दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : षष्ठभाव : मंगल छठें भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को शत्रुपक्ष पर विशेष सफलता मिलती है और शत्रु, झगड़े-टंटे तथा मामा के द्वारा लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक शारीरिक परिश्रम खूब करता है तथा उसी से धन भी कमाता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तम भाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को व्यावसायिक तथा स्त्री- पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। चौथी मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता तथा राज्यपक्ष से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है, परन्तु रक्त-विकार आदि रोग भी हो सकते हैं। आठवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन-संचय में कमी रहती है तथा कुटुम्ब के कारण क्लेश भी मिलता है।