भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१८१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : द्वितीयभाव : मंगल \qquad दूसरे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब को हानि उठानी पड़ती है। शत्रुपक्ष भी नुकसान पहुँचाता है। जुए-सट्टे में भी हानि होती है। चौथी दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान पक्ष में कमी रहती है तथा विद्या-बुद्धि का लाभ भी गुप्त युक्तियों से होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। आठवीं शत्रु- दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म में रुचि नहीं होती तथा भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली से 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : तृतीयभाव : मंगल \qquad तीसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का सुख कुछ परेशानी के साथ मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर विजय मिलती है तथा शत्रुओं से लाभ होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म का सामान्य लाभ होता है। आठवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण राज्य तथा पिता के पक्ष से यश, धन आदि का लाभ होता है तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : चतुर्थभाव : मंगल \qquad चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता से सामान्य वैमनस्ययुक्त लाभ होता है तथा भूमि, भवन एवं घरेलू सुख भी कुछ कठिनाइयों के साथ ही मिलता है। चौथी मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में सामान्य परेशानियां रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य द्वारा यश एवं लाभ मिलता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से जातक की आमदनी अच्छी रहती है।