भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 638 में से

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१८० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुनलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा से जातक को धन का पर्याप्त लाभ होता है तथा कौटुम्बिक सुख भी मिलता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पर्याप्त सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति विद्वान्, बुद्धिमान्, सन्ततिवान् धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में उच्चस्थ चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता रहता है। कुटुम्ब की शक्ति में कुछ कमी आती है। सातवीं नीचदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष में स्वयं झुक कर अपना काम निकालना पड़ता है तथा रोग, झगड़े आदि के कारण मन में थोड़ी-बहुत अशान्ति भी बनी रहती है। 'मिथुन' लग्न में 'मंगल' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मिथुनलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक अपने शारीरिक श्रम द्वारा यथेष्ट धन कमाता है तथा शत्रुपक्ष में भी विजयी होता है चौथी मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता तथा घरेलू सुख का असन्तोषपूर्ण लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री को रोग तथा परेशानियां रहती हैं, परिश्रम द्वारा व्यवसाय से लाभ होता है। सातवीं उच्चदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी तथा झगड़ालू होता है।

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