भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१८८ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक स्व-विवेक एवं शारीरिक परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ उठाता है। उसे माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने के कारण विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा सन्तान-पक्ष से लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति सुखी, सुन्दर, मधुर- भाषी, धनी तथा विवेकी होता है। 'मिथुन' लग्न को कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश बारहवें भाव में मित्र शुक्र का राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। माता, मिथुन लग्न : द्वादशभाव : बुध भूमि तथा मकान के सुख में भी कमी रहती है। जातक को अपनी जन्म-भूमि से दूर रहने पर लाभ एवं सुख मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष में विवेक एवं शांति द्वारा सफलता मिलती है। खर्च के कारण भीतरी चिंताएँ रहते हुए भी वह अपने ऊपरी प्रभाव को बनाये रखता है। 'मिथुन' लग्न में 'गुरु' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को सुख, शारीरिक सौन्दर्य, स्वाभिमान तथा मनोबल की प्राप्ति होती है। पिता तथा राज्य से भी लाभ होता है। मिथुन लग्न : प्रथमभाव : गुरु पाँचवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री का सुख अच्छा रहता है तथा नवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव की देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है।