भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

१६० 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा धैर्य, गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम का आश्रय लेकर ही वह कुछ सफलताएँ प्राप्त करता है। उसके जीवन में सुख- दुःख तथा गरीबी-अमीरी का क्रम निरन्तर आता-जाता बना रहता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की अपने पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा सफलता पाने के लिए गुप्त युक्तियों, परिश्रम एवं धैर्य का आश्रय लेना पड़ता है। परन्तु ऊपरी दृष्टि से वह एक अमीर तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति जान पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से कुछ रुकावटों के साथ जातक की आमदनी के क्षेत्र में सफलताएँ प्राप्त होती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के द्वारा लाभ कमाता है। संकटों में भी वह अपना धैर्य नहीं खोता, अतः अन्त में उसे सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी भी बहुत होता है।