भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 638 में से

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१५६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष का हिम्मत के साथ मुकाबला करता और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है। परन्तु मामा के सुख में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा गुप्त विद्याओं में कुशल होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष द्वारा कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं। गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर वह थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है। उसे इन्द्रिय-विकारों का भी सामना करना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृष लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक की आयु एवं पुरातत्व के क्षेत्र में अनेक कठिनाइयों तथा हानियों का सामना करना पड़ता है। परन्तु यह सौम्य तथा सज्जन बना रहता है। ऐसा जातक गुप्त चिन्ताओं से ग्रस्त हो, गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है तथा बाहरी सम्बन्धों से जीवन-निर्वाह करता है।

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