भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

१६१ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश वृषलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और चातुर्य तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ऊपरी दिखावे में ऐसा व्यक्ति सम्पन्न तथा प्रभावशाली प्रतीत होता है। कठिन परिश्रम के द्वारा उसे सफलताएँ भी मिलती हैं। 'वृष' लग्न में 'केतु' 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा मन में कुछ चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शारीरिक श्रम एवं योग्यता के बलबूते पर अन्य लोगों को प्रभावित भी करता है। उसके शरीर पर किसी घाव अथवा चोट का चिह्न भी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के केतु के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब के मामले में अनेक चिन्ताओं तथा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कठिन परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों का सहारा लेकर धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में यत्किंचित् सफलता ही प्राप्त कर पाता है।