भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१६२ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है तथा भाई-बहिनों के सम्बन्ध से भी कष्ट एवं हानि का सामना करना पड़ता है। परन्तु ऐसा जातक अपनी आन्तरिक दुर्बलता को छिपाये रखकर गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के सहारे अभावों को दूर करने में थोड़ी- बहुत सफलता भी पा लेता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा पारिवारिक सुख के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के सहारे जीवित रहता है। ऐसे व्यक्ति को स्वदेश त्याग कर परदेश में भी रहना पड़ता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : पंचमभाव : केतु पांचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अपने साहस एवं गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलता भी प्राप्त कर लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा अपने मन्तव्य को प्रकट न करने वाला होता है।