भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 638 में से

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१६३ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर अपना विशेष प्रभाव स्थापित करने में समर्थ होता है तथा धैर्य, परिश्रम, गुप्त युक्ति, साहस आदि के बल पर समस्त विघ्न- बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है। वह बड़ा परिश्रमी, चतुर तथा धैर्यवान् होता है। मामा के पक्ष से कुछ हानि भी होती है।

'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को स्त्री के पक्ष में बहुत कष्ट तथा हानि का शिकार होना पड़ता है। वह मूत्राशय के रोगों से पीड़ित होता है। व्यवसाय तथा घरेलू जीवन के क्षेत्र में भी उसे कभी-कभी बड़ी असफलताएँ मिलती हैं, परन्तु वह अपने श्रम द्वारा कुछ शक्ति भी प्राप्त करता है।

'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व सम्बन्धी कोई विशेष लाभ होता है। वह जीवन-निर्वाह के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। वह अपने जीवन को ऐश्वर्यशाली ढंग से व्यतीत करता है।

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