भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१६४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपने भाग्य की उन्नति करता है। धर्म में आस्था रखते हुए भी विशेष श्रद्धा नहीं दिखाता। संक्षेप में, ऐसा जातक धर्म का दिखावा न करने वाला, साहसी, परिश्रमी तथा गुप्त शक्तियों द्वारा काम लेने वाला होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में अपने मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पिता तथा राज्य के क्षेत्र में कुछ हानि उठानी पड़ती है। वह बड़े परिश्रम के साथ सामान्य सफलता प्राप्त करता है। वह ऊपरी दिखावे में अमीर, सुखी तथा सम्मानित प्रतीत होता है, परन्तु भीतर से कमजोरी बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश वृषलग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की अपनी आमदनी के क्षेत्र में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके जीवन में कभी अच्छा लाभ होता है तो कभी विशेष संकट भी सामने आते हैं। ऐसा व्यक्ति साहसी तथा परिश्रमी होता है।