भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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१५६ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव से जातक धर्मात्मा तथा भाग्यवान होता है, साथ ही उसे पिता तथा राज्य से भी श्रेष्ठ लाभ होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ गलत रास्तों से आमदनी में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु- दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से मनमुटाव रहता है। दसवीं उच्च दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव स्थापित होता है तथा माता से भी लाभ होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली से 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्नः दशमभाव : शनि दसवें भाव में स्वराशिस्य शनि के प्रभाव से जातक को पिता, व्यवसाय एवं राज्य द्वारा पर्याप्त लाभ होता है तथा प्रतिष्ठा मिलती है। तीसरी नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ त्रुटि रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख में कमी आती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष भाग्यशाली होता है, परन्तु दैनिक जीवन में चिन्ताएँ रहती हैं। ऐसा जातक बड़ा भाग्यवान् तथा सफल व्यवसायी होता है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की अपनी आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद सफलताएँ मिलती हैं तथा पिता एवं राज्य-पक्ष से भी असन्तोषपूर्ण लाभ होता है। यों, भाग्य की शक्ति प्रबल रहती है। तीसरी मित्र दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक प्रभाव तथा आयु की शक्ति प्राप्त होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के विषय में कुछ कठिनाइयों का अनुभव होता है।