भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों के साथ वैमनस्य रहता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। तीसरी मित्र- दृष्टि से पंचमभाव की देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव की देखने से भाग्य की अच्छी वृद्धि होती है। दसवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव की देखने के कारण खर्च में कमी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों में भी लापरवाही बनी रहती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित होकर शनि के प्रभाव से जातक का माता के साथ वैमनस्य रहता है तथा भूमि-भवन के सुख में भी कमी रहती है। तीसरी उच्चदृष्टि से षष्ठभाव की देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा मामा से शक्ति मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव की देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव की देखने से शारीरिक प्रभाव एवं सम्मान में वृद्धि होती है। 'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृष लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में असंतोष रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आय के साधनों से असन्तोष रहता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव की देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब की शक्ति प्राप्त होती है। ऐसा जातक धनी, प्रतिष्ठित तथा भाग्यवान होता है।