भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१६५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। वह कूट- नीतिज्ञ तथा परिश्रमी होता है। उसे सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक की धन-वृद्धि के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं, तथा शुक्र के व्ययेश होने के कारण खर्च अधिक बना रहता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की कुछ कठिनाइयों के साथ उन्नति होती है। विद्या तथा सन्तान का सुख भी प्राप्त होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के साथ वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में भी कुछ कमी आती है। ऐसा व्यक्ति भाग्य को पुरुषार्थ से बड़ा मानने वाला होता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र गुरु की राशि पर स्थित व्ययेश उच्च के शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बड़ी हानि उठानी पड़ती है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। पिता, राज्य, विद्या तथा सन्तान की शक्ति भी प्राप्त होती है। चौथी नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति अपने अहङ्कारी स्वभाव के कारण बार-बार हानि उठाता है।