भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है परन्तु खर्च भी खूब होता रहता है। मस्तिष्क में चिन्ताएं भी बनी रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव को देखने के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-बुद्धि में प्रवीणता प्राप्त होती है तथा सन्तान-पक्ष में भी कुछ कठिनाइयां आती हैं। ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क में चिन्ताएं बनी रहती हैं। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। विद्या तथा सन्तान के पक्ष में कुछ परेशानियां रहती हैं। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक शत्रु-पक्ष में चतुराई से प्रभाव स्थापित करके अपना काम निकालता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा चतुर होता है। साथ ही, उसके मस्तिष्क में चिन्ताएं भी बनी रहती हैं। 'मिथुन' लग्न में 'शनि' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है, परन्तु आयु तथा पुरातत्व की वृद्धि होती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन से वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।