भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मिथुन लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में परेशानियां आती हैं। भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में की त्रुटियां रहती हैं। यह धन-प्राप्ति के लिए अनुचित मार्ग भी अपनाता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव की देखने से शरीर को कुछ कष्ट भी रहता है तथा जातक भाग्यशाली भी बनता है। सातवीं उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में उन्नति होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले अष्टमभाव को देखने के कारण आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। नीच का शनि जातक के जीवन को अनेक संकटों तथा खतरों में डालता रहता है। 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित शनि का फलादेश मिथुन लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन एवं कुटुम्ब-सुख के पक्ष में कमी बनी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर कठिनाइयों के बाद विजय मिलती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के नवम भाव में देखने से भाग्य की वृद्धि होती है तथा जातक धर्म का पालन भी करता है। ऐसा व्यक्ति यश-अपयश तथा सुख-दुःख दोनों ही प्राप्त करता है, परन्तु भाग्यशाली समझा जाता है। 'मिथुन' लग्न में 'राहु' 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित उच्च के राहु के प्रभाव से जातक प्रभावशाली, लम्बे शरीर वाला, विवेकी, स्वार्थी, गुप्त युक्तियों का ज्ञाता तथा बड़ी हिम्मत वाला होता है। यह कष्टसाध्य कर्मों तथा गुप्त युक्तियों के आश्रय से अपनी उन्नति करता है तथा धन एवं सम्मान पाता है।