भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२०१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को धन-सम्पत्ति तथा कौटुम्बिक सुख की बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम का आश्रय लेने पर भी धन-प्राप्ति के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ ही मिलती हैं। उसे बहुत समय बाद धन का अल्प सुख मिलता है। ४१८ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। वह अपनी उन्नति के लिए बहुत हिम्मत तथा परिश्रम से लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, हिम्मती तथा गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। परन्तु कभी-कभी उसे बड़े संकटों का सामना भी करना पड़ता है। ४२० 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन एवं घरेलू सुख में कमी तथा असन्तोष की प्राप्ति होती है। वह गुप्त युक्तियों के बल पर सुख-प्राप्ति का प्रयत्न करता है, परन्तु उसकी इच्छा भली-भाँति पूर्ण नहीं हो पाती। ४२१