भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२१८ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : सूर्य सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की आयु पर कभी- कभी संकट आते रहते हैं तथा पुरातत्त्व के लाभ में भी कमी आती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के द्वितीयभाव के देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहती है तथा पेट में भी कोई रोग हो सकता है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन धनवानों जैसा होता है। ४५०

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का भाग्य प्रबल होता है। वह धर्म का पालन भी करता है तथा मान-प्रतिष्ठा भी पाता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी, सुखी, स्वार्थी तथा परमार्थी होता है। ४५१

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में स्थित उच्च के सूर्य के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, प्रतिष्ठा तथा लाभ की प्राप्ति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के साथ ही घरेलू सुख में भी कुछ कमियां बनी रहती हैं। ४५२