भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२२१ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित नीच के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाई से सफलता मिलती है। मन तथा शरीर भी दुर्बल रहता है। सातवीं उच्च दृष्टि से एकादशभाव को देखने से गुप्त मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों के बल पर आमदनी अच्छी बनी रहती है, परन्तु कुछ अशान्ति का अनुभव भी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में दुर्बलता रहती है और विनम्र बनकर काम निकालना पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश, सम्मान तथा धन प्राप्त होता है एवं खर्च की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति गौरवशाली तथा आत्मबली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में कुछ असन्तोष के बाद सफलता मिलती है तथा व्यवसाय पक्ष में भी कठिनाइयाँ आती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगादि में अधिक रुचि रखता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, मनोबल तथा आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, विलासी, सुखी तथा सुन्दर होता है।