भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ धन तथा कौटुम्बिक सुख पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु के विषय में परेशानियां आती हैं तथा पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत का जीवन बिताने वाला, प्रतिष्ठित या भाग्यशाली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में अत्यन्त वृद्धि होती है। सातवीं मित्र दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की भी पर्याप्त उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक, दानी, उदार, ईश्वर-भक्त, धनी, उत्साही, पराक्रमी तथा पुरुषार्थी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में सामान्य-मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि भवन आदि का पर्याप्त सुख उपलब्ध होता है। उसका शरीर सुन्दर तथा मन कोमल होता है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता, सहयोग एवं यश की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक हर प्रकार से सम्पन्न एवं सुखी रहता है।