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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२२० 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के साथ धन तथा कौटुम्बिक सुख पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु के विषय में परेशानियां आती हैं तथा पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत का जीवन बिताने वाला, प्रतिष्ठित या भाग्यशाली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में अत्यन्त वृद्धि होती है। सातवीं मित्र दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की भी पर्याप्त उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक, दानी, उदार, ईश्वर-भक्त, धनी, उत्साही, पराक्रमी तथा पुरुषार्थी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में सामान्य-मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि भवन आदि का पर्याप्त सुख उपलब्ध होता है। उसका शरीर सुन्दर तथा मन कोमल होता है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता, सहयोग एवं यश की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक हर प्रकार से सम्पन्न एवं सुखी रहता है।

२२१ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित नीच के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाई से सफलता मिलती है। मन तथा शरीर भी दुर्बल रहता है। सातवीं उच्च दृष्टि से एकादशभाव को देखने से गुप्त मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों के बल पर आमदनी अच्छी बनी रहती है, परन्तु कुछ अशान्ति का अनुभव भी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में दुर्बलता रहती है और विनम्र बनकर काम निकालना पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश, सम्मान तथा धन प्राप्त होता है एवं खर्च की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति गौरवशाली तथा आत्मबली होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष में कुछ असन्तोष के बाद सफलता मिलती है तथा व्यवसाय पक्ष में भी कठिनाइयाँ आती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगादि में अधिक रुचि रखता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, मनोबल तथा आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, विलासी, सुखी तथा सुन्दर होता है।

२२२ कर्क लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा पुरातत्त्व का लाभ असन्तोषजनक रहता है, परन्तु आयु की वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक अपने शारीरिक श्रम द्वारा धन-जन की वृद्धि करने में समर्थ होता है। ४६२ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को मन तथा शरीर की अच्छी शक्ति प्राप्त होती है, जिसके कारण वह अपने भाग्य की खूब उन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति भाग्यशाली, धर्मात्मा, सतोगुणी, ईश्वर-भक्त, यशस्वी तथा सज्जन होता है। ४६३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्कलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय पक्ष से प्रभाव, यश तथा लाभ प्राप्त होता है और वह किसी उच्च पद को प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति सुन्दर तथा शक्तिशाली होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण जातक को भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। ४६४

२२३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव के जातक की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों एवं सौन्दर्य में वृद्धि होती है तथा आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपने लाभ के लिए कटु शब्दों का प्रयोग करता पाया जाता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्पर्क से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में अपने शान्त स्वभाव के द्वारा प्रभाव-स्थापित करता है, परन्तु मन में कुछ अशान्ति भी बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति का शरीर दुबला-पतला होता है। 'कर्क' लग्न में मंगल 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा पिता, राज्य, सन्तान एवं विद्या का पक्ष भी दुर्बल रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष में असन्तोष- पूर्ण वृद्धि होती है तथा व्यवसाय में कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि के अष्टम भाव को देखने से पुरातत्त्व तथा दैनिक जीवन में कमी रहती है।

२२४ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। राज्य तथा पिता से भी लाभ होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पञ्चमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की शक्ति मिलने पर भी कुछ कठिनाइयों का अनुभव होता रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कमी आती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्य, यश तथा धर्म की वृद्धि होती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। विद्या तथा सन्तान का लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक बुद्धि-बल से भाग्यशाली होता है तथा यश एवं धर्म का लाभ करता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा विजय मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है। विद्या-बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। उच्च दृष्टि से सप्तम- भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय का अच्छा लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को देखने के राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सहयोग तथा यश का लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से धन की भी पर्याप्त आमदनी बनी रहती है।

२२५ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में स्वराशिस्थ मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से कुछ असन्तोष के साथ पुरातत्त्व एवं आयु का लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से लाभ-प्राप्ति के लिए दिमागी परिश्रम अधिक करना पड़ता है तथा आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से यश-धन की प्राप्ति होती रहती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की शत्रु पक्ष में विजय मिलती है तथा विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का भी श्रेष्ठ लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। आठवीं नीच-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सुख, सौन्दर्य, स्वास्थ्य तथा शान्ति में कुछ कमी बनी रहती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित उच्च के मंगल के प्रभाव से जातक की अनेक सुन्दर स्त्रियों का लाभ होता है परन्तु उनसे कुछ मतभेद भी रहता है। व्यवसाय में विशेष सफलता मिलती है तथा विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का पक्ष भी अच्छा रहता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को देखने से पिता तथा राज्य से सुख, लाभ एवं सम्मान मिलता है : सातवीं नीच दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी रहती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय खूब होता है तथा वाणी भी प्रभावशालिनी होती है।

२२६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ मिलता है, परन्तु विद्या, बुद्धि, सन्तान, पिता तथा राज्य पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से परिश्रम द्वारा लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख में वृद्धि होती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति होती है तथा विद्या, बुद्धि, सन्तान, पिता, राज्य एवं व्यवसाय पक्ष का सुख भी मिलता है। चौथी मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा परा- क्रम में वृद्धि होती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में स्थित स्वक्षेत्री मंगल के प्रभाव के जातक को राज्य, पिता एवं व्यवसाय पक्ष से सुख, यश तथा धन का लाभ होता है। चौथी नीच-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ असन्तोषजनक रहता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है तथा कोई उच्च पद भी प्राप्त होता है।

२२७ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव के जातक को कठिन परिश्रम द्वारा पर्याप्त धन लाभ होता है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। चौथी मित्रदृष्टि के द्वितीय- भाव को देखने से भी धन तथा कुटुम्ब के सुख का लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव की देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का लाभ होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा शत्रुजयी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। पिता, राज्य, संतान कर्क लग्न : द्वादशभाव : मंगल तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कमी का अनुभव होता है। चौथी मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र दृष्टि के षष्ठभाव की देखने से शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है। आठवीं उच्च- दृष्टि के सप्तमभाव को देखने के स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। परन्तु बुद्धिभ्रम तथा मस्तिष्क में परेशानी की स्थिति भी बनी रहती है। 'कर्क' लग्न में 'बुध' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथम भाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथम भाव : बुध पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल रहता है तथा भाई-बहिन के सुख में कमी आती है, परन्तु पराक्रम एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। बाहरी संबंधों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से सामान्य त्रुटियों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

२२८ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव बुध दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक को धन-संचय के लिए अधिक प्रयत्न करना पड़ता है। भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु का पूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ अपूर्ण रहता है। दैनिक जीवन सुखी तथा प्रभाव- शाली रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित बुध के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई- बहिन के सुख में कुछ कमी आती है। सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य कमजोर रहता है तथा धर्म में भी विशेष रुचि नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को अपयश भी उठाना पड़ता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव के जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है, परन्तु भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ एवं सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ मिलती हैं।

२२६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान तथा हिम्मती होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा लाभ होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सुख प्राप्त होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता एवं शांति के आश्रय से सफलता प्राप्त करता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से सामान्य सम्बन्ध बना रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की स्त्री का सुख मिलता है तथा व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण जातक के शरीर में शक्ति तथा दुर्बलता का सामंजस्य रहता है। ऐसा व्यक्ति अधिक खर्चीला होता है तथा बाहरी सम्बन्धों एवं परिश्रम के बल पर उन्नति भी करता है।

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व का कुछ कमियों के साथ लाभ होता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी आती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से खर्च चलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन का लाभ होता है, परन्तु सुख के व्ययेश होने के कारण खर्च अधिक बना रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की धर्म तथा भाग्योन्नति के क्षेत्र में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सामान्य लाभ होता है। खर्च अधिक रहता है। सातवीं उच्च दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पुरुषार्थ की वृद्धि होती है, परन्तु भाग्यो- न्नति में बाधाएं भी आती रहती हैं। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलताएँ मिलती हैं, परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि एवं भवन आदि का सामान्य लाभ होता है तथा परिश्रम द्वारा खर्च चलता है।

२३१ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण लाभ होता है, परन्तु जातक अपनी बुद्धि, विवेक- शक्ति तथा वाणी के बल पर लाभ कमाता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव के जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शान्त स्वभाव, पुरुषार्थ एवं व्यय की शक्ति से शत्रुपक्ष में सामान्य सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति धन खर्च करने के बल पर ही अनेक कठिनाइयों पर नियन्त्रण स्थापित कर पाता है। 'कर्क' लग्न में 'गुरु' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथम भाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित उच्च के गुरु के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है। पांचवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि का पूर्ण सुख मिलता है। सातवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री पक्ष तथा दैनिक खर्च में कठिनाइयां बनी रहती हैं। नवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से भाग्य की शक्ति प्रबल रहती है तथा धर्म का लाभ भी होता है।

२३२ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि के षष्ठभाव को देखने से धन की शक्ति द्वारा शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में यश, धन, सहयोग तथा सफलता का लाभ होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख मिलता है। पाँचवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि तथा क्लेश का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता रहता है। ऐसा व्यक्ति धर्मात्मा, धनी, हिम्मती तथा शत्रुजयी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण लाभ होता है। शत्रु पक्ष में शान्ति से सफलता मिलती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। नवीं मित्र दृष्टि से द्वादश भाव को देखने के कारण बाहरी संबंधों से लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक रहता है।

२३३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से बुद्धि तथा सन्तान के सहयोग से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। नवीं मित्र दृष्टि से प्रथमभाव की देखने से शारीरिक सौन्दर्य, आत्मबल तथा यश की वृद्धि होती है। गुरु के षष्ठेश होने के कारण जातक को प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव स्थापित करता है तथा यशस्वी होता है। परन्तु भाग्योन्नति में कुछ कठिनाइयां आती हैं। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव की देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित नीच के गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं तथा शत्रु पक्ष से व्यवसाय को हानि पहुँचती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से परिश्रम द्वारा लाभ होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिन का सुख भी मिलता है।

२३४ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का त्रुटिपूर्ण लाभ होता है, परन्तु शत्रु पक्ष से अशान्ति मिलती है तथा भाग्य पक्ष दुर्बल रहता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। पाँचवीं उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या- बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में भी विशेष सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलता, सुख तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से कुछ असन्तोष के साथ माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रम तथा झगड़ों के द्वारा उन्नति करता है।

२३५ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा लाभ कमाता है तथा उसे शत्रु पक्ष से भी लाभ होता है। पाँचवी मित्र- दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख सामान्य कमी के लाभ मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव की देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। नवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष एवं हानि का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति धनी अवश्य होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कमी रहती है। पाँचवीं शत्रु दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख बड़े परिश्रम द्वारा मिलता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठ भाव को देखने से शत्रुपक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है। 'कर्क' लग्न में 'शुक्र' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, सुख तथा चातुर्य का लाभ होता है। माता तथा भूमि का बुध भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है तथा भोगादि में खूब रुचि बनी रहती है। ऐसा जातक सुखी, धनी, विलासी तथा ऐश्वर्यशाली होता है।

२३६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को धन-कुटुम्ब का सामान्य असन्तोष के साथ सुख प्राप्त होता है तथा भूमि एवं भवन का सुख भी मिलता है। माता के सुख में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। ऐसा जातक धनी तथा सुखी जीवन बिताता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी रहती है। माता के सुख में भी कमी का अनुभव होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य की श्रेष्ठ वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन भी होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी भीतरी कमजोरियों को छिपाकर प्रकट में हिम्मती बना रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। आय में वृद्धि होने से वह धनी भी बनता है। सातवी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता, सुख, यश एवं धन की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा चतुर, प्रतिष्ठित तथा धनी होता है।

२३७ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादशभाव को देखने से आमदनी भी अच्छी रहती है तथा धन का लाभ खूब होता है। ऐसे व्यक्ति को माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है, परन्तु माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी तथा अशान्ति भी रहती है। लाभ के मार्ग में भी परतन्त्रता का योग बनता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी सम्बन्धों से सुख तथा लाभ मिलता है तथा खर्च अधिक रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्कलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित सुख के प्रभाव से जातक को स्त्री, व्यवसाय तथा दैनिक आय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, चातुर्य एवं सुख की प्राप्ति भी होती है।

२३८ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा परदेश में रहकर उन्नति करता है। घरेलू सुख में कुछ कमी भी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन-संचय नहीं हो पाता तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी रहती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित उच्च शुक्र के प्रभाव से जातक के धर्म तथा भाग्य को विशेष वृद्धि होती है। माता, भूमि तथा भवन का उत्तम सुख भी मिलता है। सातवीं दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यवादी, धनी सुखी तथा सौभाग्यशाली होता है। कर्क लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलताएँ मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख भी प्रभूत मात्रा में उपलब्ध होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, गंभीर, चतुर, बुद्धिमान, शृंगार-प्रिय, प्रेमी तथा ऐश्वर्यशाली होता है।

२३६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश 'कर्क' लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव से जातक को आमदनी अच्छी रहती है तथा माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति योग्य, चतुर, धनी, सुखी तथा श्रेष्ठवाणी बोलनेवाला होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख एवं लाभ उठाता है तथा उसका खर्च अधिक रहता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है तथा मातृभूमि से अलग भी रहना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष में चातुर्य एवं खर्च से काम निकालने में सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न में 'शनि' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है तथा शरीर में रोग भी रहता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई- बहिन का त्रुटिपूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्र में सप्तमभाव को देखने से व्यावसायिक क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा स्त्री का सुख होने पर भी उससे कुछ परेशानी रहती है। दसवीं नीच-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता एवं सम्मान का सामान्य लाभ होता है।