भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें२२७ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव के जातक को कठिन परिश्रम द्वारा पर्याप्त धन लाभ होता है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। चौथी मित्रदृष्टि के द्वितीय- भाव को देखने से भी धन तथा कुटुम्ब के सुख का लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव की देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का लाभ होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा शत्रुजयी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। पिता, राज्य, संतान कर्क लग्न : द्वादशभाव : मंगल तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कमी का अनुभव होता है। चौथी मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र दृष्टि के षष्ठभाव की देखने से शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है। आठवीं उच्च- दृष्टि के सप्तमभाव को देखने के स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। परन्तु बुद्धिभ्रम तथा मस्तिष्क में परेशानी की स्थिति भी बनी रहती है। 'कर्क' लग्न में 'बुध' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथम भाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथम भाव : बुध पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल रहता है तथा भाई-बहिन के सुख में कमी आती है, परन्तु पराक्रम एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। बाहरी संबंधों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से सामान्य त्रुटियों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।