भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२२६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ मिलता है, परन्तु विद्या, बुद्धि, सन्तान, पिता तथा राज्य पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से परिश्रम द्वारा लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख में वृद्धि होती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति होती है तथा विद्या, बुद्धि, सन्तान, पिता, राज्य एवं व्यवसाय पक्ष का सुख भी मिलता है। चौथी मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा परा- क्रम में वृद्धि होती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में स्थित स्वक्षेत्री मंगल के प्रभाव के जातक को राज्य, पिता एवं व्यवसाय पक्ष से सुख, यश तथा धन का लाभ होता है। चौथी नीच-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ असन्तोषजनक रहता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है तथा कोई उच्च पद भी प्राप्त होता है।