भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 638 में से

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२५० 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को आयु-पक्ष में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्ट होते हैं तथा पुरातत्व की हानि भी होती है। पेट विकारग्रस्त रहता है। धन का संकट तथा गुप्त चिन्ताएं रहती हैं। ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप से अपनी उन्नति तथा सुख के लिए निरन्तर प्रयत्नशील बना रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को अपनी भाग्योन्नति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा कभी-कभी बड़े संकटों तथा विफलताओं का शिकार भी होना पड़ता है। वह गुप्त रूप से अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करता है, परन्तु भाग्योन्नति बड़ी धीमी गति से ही होती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। यश तथा प्रतिष्ठा को धक्का भी लगता है परन्तु वह अपनी गुप्त युक्ति एवं परिश्रम द्वारा पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है।

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