भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२५१ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त होती है। सातवीं दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं कौटुम्बिक सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित उच्च के सूर्य के प्रभाव से जातक की भाग्य-शक्ति प्रबल होती है तथा धर्म में भी अभिरुचि बनी रहती है। सातवीं नीच दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से जातक को भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है तथा पराक्रम के बारे में ऐसा व्यक्ति लापरवाह रहता है। स्थूल शरीर वाला भाग्यवान तथा ईश्वर-भक्त होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का पिता से वैमनस्य रहता है, परन्तु राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति एवं मान-प्रतिष्ठा का लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख भी मिलता है।