भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२६० 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। यह आत्मज्ञानी तथा उग्र मस्तिष्क वाला होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा पर्याप्त आमदनी होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी भी होता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली से 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु शनि को राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है तथा कठिनाइयों से घबराता नहीं है। शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग एवं परतंत्रता के योग भी बनते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के संबंध से भी लाभ होता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से वैमनस्य रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठि- नाइयों के बाद सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं स्वाभिमान में वृद्धि होती है और वह अपने यश का विस्तार भी करता है।