भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब के सुख में वृद्धि होती है, परन्तु उसी के कारण कुछ परतंत्रता का अनुभव भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा जातक समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति समझा जाता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की तुला राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातकों का भाई- बहिनों से वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में कुछ कमी आती है। फिर भी वह जातक बड़ा हिम्मती होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक के भाग्य में वृद्धि होती है तथा वह धर्म में भी आस्था रखता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख प्राप्त होता है तथा शरीर सुखी रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण जातक का पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक प्रयत्न करने पर ही सफलता मिलती है।