भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ 'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६४८ से ६५९ के बीच देखना चाहिए। २. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६४८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६४९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६५० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६५१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६५२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६५३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६५४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६५५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६५६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६५७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६५८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६५९ 'सिंह' लग्न में 'सूर्य' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित सूर्य का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली संख्या: ५५७] प्रथम भाव (लग्न): ५ (सिंह), सू. द्वितीय भाव: ६ (कन्या) | तृतीय भाव: ७ (तुला) चतुर्थ भाव: ८ (वृश्चिक) | पंचम भाव: ९ (धनु) षष्ठ भाव: १० (मकर) | सप्तम भाव: ११ (कुम्भ) अष्टम भाव: १२ (मीन) | नवम भाव: १ (मेष) दशम भाव: २ (वृष) | एकादश भाव: ३ (मिथुन) द्वादश भाव: ४ (कर्क) पहले भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक शारीरिक शक्ति, आत्मबल तथा सौन्दर्य का लाभ प्राप्त करता है। वह बड़ा हिम्मती तथा लम्बे कद का होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से जातक को स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयां आती हैं तथा असन्तोष बना रहता है।