भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 638 में से

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२६३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की धन की अल्प हानि होती है। उसका रहन-सहन ठाठदार होता है। कुटुम्ब से भी कुछ असन्तोष रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ तथा सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु-वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी कुछ कमी के साथ लाभ होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म की उन्नति होती है तथा खर्च आराम से चलता रहता है। अन्य लोगों की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति धनी तथा सुखी समझा जाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख कुछ कष्ट के साथ अल्प परिमाण में मिलता है तथा घरेलू खर्चों से परेशानी बनी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सुख तथा सफलता की प्राप्ति होती है।

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