भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२८३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की आमदनी में खूब वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन एवं पिता का श्रेष्ठ सुख भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का भी विशेष लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी वाणी द्वारा सबको प्रभावित करने वाला, सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के सम्बन्ध से लाभ होता है। पिता तथा भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक शत्रु-पक्ष में चातुर्य द्वारा प्रभावशाली बना रहता है तथा अपनी हिम्मत से सभी झगड़ों में विजय प्राप्त करता है। 'सिंह' लग्न में 'शनि' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की शारीरिक कष्ट, रोगादि होते हैं, परन्तु शत्रु-पक्ष पर कुछ प्रभाव बना रहता है। तीसरी उच्च-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के लाभ, यश तथा सुख प्राप्त होता है।